जयपुर। जब सुर सम्राट मोहम्मद रफ़ी साहब का ज़िक्र होता है, तो शब्द कम पड़ जाते हैं और भावनाएं गीतों का रूप ले लेती हैं। कुछ ऐसा ह...
जयपुर। जब सुर सम्राट मोहम्मद रफ़ी साहब का ज़िक्र होता है, तो शब्द कम पड़ जाते हैं और भावनाएं गीतों का रूप ले लेती हैं। कुछ ऐसा ही नज़ारा पिंक सिटी में देखने को मिला, जहाँ प्रतिष्ठित संगीत संस्था 'म्यूजिकल बंदे' ने सुर सम्राट रफ़ी साहब की 101वीं जयंती को समारोह पूर्वक मनाया। मालवीय नगर स्थित 'उत्सव बैंक्वेट' में आयोजित इस शाम में मानों रफ़ी साहब की यादें हर धड़कन में धड़क रही थीं।
कार्यक्रम की शुरुआत रफ़ी साहब की मुस्कुराती तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर की गई। यह सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस 'आवाज़ के जादूगर' के प्रति सम्मान था जिसने पीढ़ियों को प्रेम करना और जीना सिखाया। वो केवल गायक नहीं, बल्कि संगीत की साधना थे।
म्यूजिकल बन्दे के संस्थापक राजेश शर्मा ने कहा कि रफ़ी साहब सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि संगीत की वह पवित्रता हैं जो सीधे परमात्मा से जोड़ती है। उनकी आवाज़ उस सागर की तरह है जिसका कोई तट नहीं। आज उनकी 101वीं जयंती पर हमारा यह प्रयास उसी महान सागर के प्रति हमारी श्रद्धा की एक छोटी सी बूंद है।
म्यूजिकल बंदे के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के जरिए रफ़ी साहब के युग को जीवंत कर दिया:
राजेश शर्मा ने 'अभी ना जाओ छोड़कर' गाकर शाम में एक मधुर कसक पैदा कर दी।
धर्मेंद्र छाबड़ा ने 'चौदहवीं का चाँद' गाकर महफ़िल को आलोकित कर दिया।
संजय कौशिक की आवाज़ में 'क्या हुआ तेरा वादा' ने पुरानी यादें ताज़ा कर दीं।
अनिल तिवाड़ी ने जब 'ओ दुनिया के रखवाले' के सुर लगाए, तो पूरा सभागार एक अलौकिक शांति से भर गया।
राजीव नागौरी की प्रस्तुति 'तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे' ने मानों हर किसी के हृदय की बात कह दी।
इसी तरह जितेन्द्र मुद्गल, राजेश जैन, हरि सिंह चौधरी, विक्टर मोटवानी, विजय धुधोडिया, हेमंत सोंखिया और राजीव कुमार ने भी रफ़ी साहब के अलग-अलग अंदाज़ के गीतों को पेश कर उन्हें अपनी स्वरांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम के अंत में धर्मेंद्र छाबड़ा ने सभी का आभार जताते हुए कहा कि रफ़ी साहब आज भी हम सबके बीच अपने गीतों के ज़रिए जीवित हैं। यह शाम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक विरासत को रफ़ी साहब की यादों से सींचने का एक पुनीत प्रयास था।
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